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अपनी पहचान

एक एक कदम बढ़ाके तू,
पार करले रेगिस्तान,
दुख-दर्द भुला कर तू,
बना ले अपनी पहचान ।

बगीचे का तू फूल नहीं,
पहाड़ों का नहीं तू वन,
बंजर ज़मीन से उठा है तू,
संघर्ष कर तू हर क्षण ।

नदियों मैं लहरें है आती,
बादल जब बरसाये पानी,
पर तू किसी की राह ना देख,
समुद्र जैसा बन सर्वशक्तिशाली ।

सामन्य न समझ तू खुदको,
श्रम कर और बन तू महान,
दुख-दर्द भुला कर तू,
बना ले अपनी पहचान ।

Poetry, Quill

ज़िंदा तो हो ही ना तुम!

तो क्या हुआ जो दिल टूट गया,
ज़िंदा तो हो ही ना तुम!

तो क्या हुआ जो ख्वाहिशें नहीं हुई पूरी,
तो क्या हुआ जो छोड़ गया वो तुम्हे,
तो क्या हुआ जो इबादत सरीखा ईश्क़ अधूरा रह गया,
ज़िंदा तो हो ही ना तुम!

तो क्या हुआ जो अंदर सब खोखला सा रह गया,
ज़िंदा तो हो ही ना तुम!

तो क्या हुआ जो दिल हो गया पत्थर,
तो क्या हुआ जो आँखें बन गयी दरिया,
तो क्या हुआ जो लिपट गयी खामोशियाँ,
ज़िंदा तो हो ही ना तुम!

तो क्या हुआ जो दिल टूट गया,
ज़िंदा तो हो ही ना तुम!

Poetry, Quill

बैठ गया हूँ फिर…

बैठ गया हूँ फिर अपनी छोटी सी यह डायरी लेकर,
कानों में आवाज़ तेरी,
चेहरे पर मुस्कुराहट है,
एक हाथ में कलम और दूजे में तेरा हाथ है.

ख़ैर पता तो था घंटे भर की बात है सारी
आखिर कानों में आवाज़ है अब भी तेरी
चेहरे पर भी मुस्कुराहट है
एक हाथ में कलम पर दूजे में अब
सिर्फ तेरा एहसास है.